रणथम्भोर दुर्ग

रणथंभोर दुर्ग दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग के सवाई माधोपुर रेल्वे स्टेशन से 13कि॰मी॰ दूर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच समुद्रतल से ४८१ मीटर ऊंचाई पर १२ कि॰मी॰ की परिधि में बना एक दुर्ग है। दुर्ग के तीनो और पहाडों में प्राकृतिक खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है। यूनेस्को की विरासत संबंधी वैश्विक समिति की 36वीं बैठक में 21 जून 2013 को रणथंभोर को विश्व धरोहर घोषित किया गया। यह राजस्थान का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। मध्यकाल से पूर्व यहां नागिल जाटों का शासन था।

रणथंबोर दुर्ग

रणथंबोर दुर्ग का वास्तविक नाम ( रंत:पूर ) है इसका अर्थ रन की घाटी में स्थित नगर रन उस पहाड़ी का नाम है जो दुर्ग की पहाड़ी के नीचे स्थित है एवं थम उस पहाड़ी का नाम है जिस पर किला बना है इसी कारण इसका नाम रणस्तंभपुर हो गया।

हीराचंद ओझा के अनुसार रणथंबोर का किला अंडाकृति वाले एक ऊंचे पहाड़ पर स्थित है यह सात पहाड़ियों के मध्य स्थित है इस कारण यह दुर्ग गिरी दुर्ग वन दुर्ग की श्रेणी में आता है इसका निर्माण आठवीं शताब्दी में चौहान शासक राजा जयंत द्वारा कराया गया ...आगे पढ़ें

रणथंभोर दुर्ग दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग के सवाई माधोपुर रेल्वे स्टेशन से 13कि॰मी॰ दूर रन और थंभ नाम की पहाडियों के बीच समुद्रतल से ४८१ मीटर ऊंचाई पर १२ कि॰मी॰ की परिधि में बना एक दुर्ग है। दुर्ग के तीनो और पहाडों में प्राकृतिक खाई बनी है जो इस किले की सुरक्षा को मजबूत कर अजेय बनाती है। यूनेस्को की विरासत संबंधी वैश्विक समिति की 36वीं बैठक में 21 जून 2013 को रणथंभोर को विश्व धरोहर घोषित किया गया। यह राजस्थान का एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। मध्यकाल से पूर्व यहां नागिल जाटों का शासन था।

रणथंबोर दुर्ग

रणथंबोर दुर्ग का वास्तविक नाम ( रंत:पूर ) है इसका अर्थ रन की घाटी में स्थित नगर रन उस पहाड़ी का नाम है जो दुर्ग की पहाड़ी के नीचे स्थित है एवं थम उस पहाड़ी का नाम है जिस पर किला बना है इसी कारण इसका नाम रणस्तंभपुर हो गया।

हीराचंद ओझा के अनुसार रणथंबोर का किला अंडाकृति वाले एक ऊंचे पहाड़ पर स्थित है यह सात पहाड़ियों के मध्य स्थित है इस कारण यह दुर्ग गिरी दुर्ग वन दुर्ग की श्रेणी में आता है इसका निर्माण आठवीं शताब्दी में चौहान शासक राजा जयंत द्वारा कराया गया

1192 में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविंद राज ने चौहान वंश की नीव रणथंबोर दुर्ग में रखी

अब्दुल फजल ने इस दुर्ग को देखकर कहा कि और दुर्ग नंगे हैं परंतु यह दुर्ग बख्तरबंद है

रणथंबोर दुर्ग दिल्ली मालवा एवं मेवाड़ से निकट होने के कारण इस दुर्ग पर बार-बार आक्रमण होते रहे हैं रणथंबोर दुर्ग पर सर्वप्रथम कुतुबुद्दीन ऐबक ने आक्रमण किया 1291 1292 में सुल्तान जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने रणथंबोर दुर्ग पर दो बार आक्रमण किया परंतु उसने दुर्ग कड़ी सुरक्षा व्यवस्था देखकर यह कहते हुए कि ऐसे 10 किलो को तो मैं मुसलमानो के मूंछ के एक बाल के बराबर भी नहीं समझता वापस चला गया

रणथंबोर दुर्ग में स्थित प्रवेश द्वार

1 नौलखा दरवाजा - इसका जीर्णोद्वार जयपुर के महाराजा जगत सिंह ने कराया

2 तोरण दरवाजा/अंधेरी दरवाजा - मुस्लिम शासक द्वारा /त्रिपोलिया दरवाजा- जयपुर शासन द्वारा

3 हाथीपोल

4 सूरजपोल

5 गणेशपोल

दुर्ग में स्थित दर्शनीय स्थल

1 जोगी महल

2 जयसिंह की छतरी हमीर ने अपने पिता की मृत्यु के बाद उसकी समाधि पर लाल पत्थरों से 32 विशाल खंभो वाली 50 फीट ऊंची छतरी बनवाई जिस पर बैठकर न्याय करता था इसलिए इसे न्याय की छतरी भी कहते हैं

3 त्रिनेत्र गणेश मंदिर

4 पदमला तालाब सुपारी महल हमीर महल बादल महल शिव मंदिर लक्ष्मी नारायण मंदिर

प माला महल कचहरी महलद

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